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प्रार्थना का महत्व

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प्रार्थना मनुष्य की श्रेष्ठता की प्रतीक है क्योंकि यह उसके और परमात्मा के घनिष्ठ संबंधों को दर्शाती है । हरएक धर्म में प्रार्थना का बड़ा महत्व है । सभी धर्म-गुरुओं, ग्रंथों और संतों ने प्रार्थना पर बड़ा बल दिया है । उन्होंने प्रार्थना को मोक्ष का द्वार कहा है । प्रार्थना में परमेश्वर की प्रशंसा, स्तुति, गुणगान, धन्यवाद, सहायता की कामना, मार्गदर्शन की ईच्छा, दूसरों का हित चिंतन आदि होते हैं । प्रार्थना चुपचाप, बोलकर या अन्य किसी विधी से की जा सकती है । यह अकेले और सामूहिक, दोनों रूपों में होती है । यह ध्यान के रूप में या किसी धर्म ग्रंथ के पढ़ने के रूप में भी हो सकती है । प्रार्थना में माला, जाप, गुणगान पूजा संगीत आदि का सहारा लिया जाता है । बिना किसी ऐसे साधन के भी प्रार्थना की जा सकती है । प्रार्थना करने की कोई भी विधि अपनाई जा सकती है, और सभी श्रेष्ठ हैं । प्रार्थना एक तरह से परमेश्वर और भक्त के बीच बातचीत है । इस में भक्त भगवान को अपनी सारी स्थिति स्पष्ट कर देता है कुछ छिपाता नहीं । इसमें जितनी सच्चाई, सफाई, तन्मयता और समर्पण-भाव होगा, वह उतना ही प्रभावकारी होगी । प्रार्थना कभ...

मित्रता

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जीवन में बहुत महत्वपूर्ण वस्तुओं के होने के बावजूद भी एक इंसान के जीवन में मित्रता एक बहुत ही मूल्यवान रिश्ता है। कोई भी जीवन को पूरी तरह से संतोषजनक नहीं बीता सकता अगर उसके पास भरोसेमंद दोस्ती नहीं है। हरेक को जीवन की अच्छी-बुरी यादें, असहनीय घटना और खुशी के पल को साझा करने के लिये एक अच्छे और निष्ठावान मित्र की ज़रुरत होती है। सभी के जीने के लिये एक अच्छे और संतुलित मानव अन्योन्यक्रिया की बहुत आवश्यकता होती है। अच्छे दोस्त एक-दूसरे की संवेदनाओं और भावनाओं को बाँटते हैं जो स्वस्थ होने और मानसिक संतुष्ठि का एहसास लाता है। एक मित्र ऐसा इंसान है जिसे कोई गहराई से जान सकता है, हमेशा पसंद और भरोसा कर सकता है। दोस्ती में शामिल दो व्यक्तियों के स्वाभाव में कुछ एकरुपता होने के बावजूद, उनके पास कुछ अलग विशेषताएँ होती है लेकिन बिना एक-दूसरे के अनोखेपन को बदले उन्हें एक-दूसरे की ज़रुरत होती है। आमतौर पर, बिना आलोचना के दोस्त एक-दूसरे को प्रेरित करते हैं लेकिन कई बार कुछ सकारात्मक बदलाव लाने के लिये दोस्त अपने दूसरे मित्र की बुराई भी करता है। इसमें शामिल हुए व्यक्ति के जीवन में एक सच्ची दो...

शायरी - ए - ग़ालिब

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फिर तेरे कूचे को जाता है ख्याल दिल -ऐ -ग़म गुस्ताख़ मगर याद आया कोई वीरानी सी वीरानी है . दश्त को देख के घर याद आया सादगी पर उस के मर जाने की  हसरत दिल में है बस नहीं चलता की फिर खंजर काफ-ऐ-क़ातिल में है देखना तक़रीर के लज़्ज़त की जो उसने कहा मैंने यह जाना की गोया यह भी मेरे दिल में है मेह वो क्यों बहुत पीते बज़्म-ऐ-ग़ैर में या रब आज ही हुआ मंज़ूर उन को इम्तिहान अपना मँज़र इक बुलंदी पर और हम बना सकते “ग़ालिब” अर्श से इधर होता काश के माकन अपना फिर उसी बेवफा पे मरते हैं फिर वही ज़िन्दगी हमारी है बेखुदी बेसबब नहीं ‘ग़ालिब’ कुछ तो है जिस की पर्दादारी है दिल से तेरी निगाह जिगर तक उतर गई दोनों को एक अदा में रजामंद कर गई मारा ज़माने ने ‘ग़ालिब’ तुम को वो वलवले कहाँ , वो जवानी किधर गई ग़ालिब ‘ हमें न छेड़ की फिर जोश -ऐ -अश्क से बैठे हैं हम तहय्या -ऐ -तूफ़ान किये हुए

आचार्य चाणक्य

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आपको अगर अपने जीवन को सफल बनाना है और अपने जीवन की छोटी – छोटी परेशानियों को दूर करना है तो आपको विद्वान आचार्य चाणक्य की बातों को अपने जीवन में उतारना शुरू कर देना चाहिए. आचार्य चाणक्य ने जिस तरह से कूटनीति और राजनीति की सरल व्याख्या की है उससे हर व्यक्ति अपनी जीवन को आसान बना सकता है. आपको अपने जीवन को शानदार बनाना है तो चाणक्य नीति पढना शुरू कर देना चाहिये. प्रसिद्ध पुस्तको में शुमार चाणक्य नीति, अर्थशात्र, अर्थनीति, कृषि, और समाजनीति आदि ग्रन्थ स्वंय चाणक्य ने लिखी हैं इनको इन ग्रंथो का जनक भी माना जाता हैं. चाणक्य राजा चन्द्रगुप्त मौर्य के शासन में महामंत्री थे और चाणक्य के चाल से ही नन्द वंश का नाश करके चन्द्रगुप्त मौर्य को राजा बनाया और भारतवर्ष में चाणक्य को एक समाज का सेवक और विद्वान माना जाता हैं. इनके जन्म और मृत्यु के विषय में अभी साफ-साफ उल्लेख नहीं है फिर भी लोग इनका जन्म ईसापूर्व से 375 को मानते हैं और इनकी मृत्यु ईसापूर्व से 283 को मानते है. चाणक्य का जन्म पंजाब में हुआ था और मृत्यु पाटलिपुत्र में हुई थी. चाणक्य हिन्दू धर्म को मानते थे व इनके अनेक नाम है जैस...

विद्यार्थी जीवन

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              विद्‌यार्थी जीवन साधना और तपस्या का जीवन है । यह काल एकाग्रचित्त होकर अध्ययन और ज्ञान-चिंतन का है । यह काल सांसारिक भटकाव से स्वयं को दूर रखने का काल है । विद्‌यार्थियों के लिए यह जीवन अपने भावी जीवन को ठोस नींव प्रदान करने का सुनहरा अवसर है । यह चरित्र-निर्माण का समय है । यह अपने ज्ञान को सुदृढ़ करने का एक महत्त्वपूर्ण समय है । विद्‌यार्थी जीवन पाँच वष की आयु से आरंभ हो जाता है । इस समय जिज्ञासाएँ पनपने लगती हैं । ज्ञान-पिपासा तीव्र हो उठती है । बच्चा विद्‌यालय में प्रवेश लेकर ज्ञानार्जन के लिए उद्‌यत हो जाता है । उसे घर की दुनिया से बड़ा आकाश दिखाई देने लगता है । नए शिक्षक नए सहपाठी और नया वातावरण मिलता है । वह समझने लगता है कि समाज क्या है और उसे समाज में किस तरह रहना चाहिए । उसके ज्ञान का फलक विस्तृत होता है । पाठ्‌य-पुस्तकों से उसे लगाव हो जाता है । वह ज्ञान रस का स्वाद लेने लगता है जो आजीवन उसका पोषण करता रहता है । विद्‌या अर्जन की चाह रखने वाला विद्‌यार्थी जब विनम्रता को धारण करता है तब उसकी राहें आसान हो जाती हैं । विनम्...

हमारा भारत

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भारत के ऐतिहासिक एवं दर्शनीय स्थल 🏛अमरनाथ गुफा                                                                   ➖काश्मीर 🏛सूर्य मन्दिर (ब्लैक पगोडा)                                                   ➖ कोणार्क 🏛वृहदेश्वर मन्दिर                                                                   ➖तन्जौर 🏛दिलवाड़ा मन्दिर                                                        ...

मासूमियत☺

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एक छोटा सा बच्चा अपने दोनों हाथों में एक एक एप्पल लेकर खड़ा था . उसके पापा ने मुस्कराते हुए कहा कि "बेटा एक एप्पल मुझे दे दो"😇 . . इतना सुनते ही उस बच्चे ने एक एप्पल को दांतो से कुतर लिया.😂😑😝 . . उसके पापा कुछ बोल पाते उसके पहले ही उसने अपने दूसरे एप्पल को भी दांतों से कुतर लिया . अपने छोटे से बेटे की इस हरकत को देखकर बाप ठगा सा रह गया और उसके चेहरे पर मुस्कान गायब हो गई थी... . . तभी उसके बेटे ने अपने नन्हे हाथ आगे की ओर बढाते हुए पापा को कहा....😊 . "पापा ये लो ये वाला ज्यादा मीठा है.😊😊 . . शायद हम कभी कभी पूरी बात जाने बिना निष्कर्ष पर पहुंच जाते हैं..😊 . . किसी ने क्या खूब लिखा है: नजर का आपरेशन तो सम्भव है,...😊 . पर नजरिये का नहीं..!!! 👌 💯 फर्क सिर्फ सोच का होता है..... . वरना , वही सीढ़ियां ऊपर भी जाती है ,और नीचे भी आती है... *************************************************************